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DATES AND PLACES : JAN 03-14 1973 Eleventh Chapter from the series of 18 Chapters - Geeta Darshan Vol-11 by Osho. These discourses were given during JAN 03-14 1973. --------------------------------------- श्रीभगवानुवाचसुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकांक्षिणः।। 52।।नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।। 53।।भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप।। 54।।मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः।निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।। 55।।इस प्रकार अर्जुन के वचन को सुनकर श्रीकृष्ण भगवान बोले, हे अर्जुन, मेरा यह चतुर्भुज रूप देखने को अति दुर्लभ है कि जिसको तुमने देखा है, क्योंकि देवता भी सदा इस रूप के दर्शन करने की इच्छा वाले हैं।और हे अर्जुन, न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं देखा जाने को शक्य हूं कि जैसे मेरे को तुमने देखा है।परंतु हे श्रेष्ठ तप वाले अर्जुन, अनन्य भक्ति करके तो इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए और तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूं।हे अर्जुन, जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सब कुछ मेरा समझता हुआ संपूर्ण कर्तव्य-कर्मों को करने वाला है और मेरे परायण है अर्थात मेरे को परम आश्रय और परम गति मानकर मेरी प्राप्ति के लिए तत्पर है तथा मेरा भक्त है और आसक्तिरहित है अर्थात स्त्री, पुत्र और धनादि संपूर्ण सांसारिक पदार्थों में स्नेहरहित है और संपूर्ण भूत-प्राणियों में वैर-भाव से रहित है, ऐसा वह अनन्य भक्ति वाला पुरुष मेरे को ही प्राप्त होता है
1h 14m 37s · Sep 23, 2023
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