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बीस बरस बाद । सत्यम तिवारी जो जहाँ है वहाँ नहीं मिलेगामरीचिकाएं अब एक पुरानी सदा हैं और उठे हुए हाथ हवा में गिर जाते हैंतय करना मुश्किल है ऐसे में मनुष्य की गतिशुरू ही होता है जिसका कालखंडबीस बरस पूर्वबर्फ़ के टुकड़े-सा चला है मेरा प्यारऔर दूर है तुम्हारा हाथ इतना दूर वास्तुनिष्ठ सत्य जितना वास्तु सेचश्मा आँख से पानी काकि हाथों हाथ लिया जाएगा फौरी सुझाव और साक्ष्यों के अभाव में मिलेगी माफ़ीनिर्देशक छूटे हुए दृश्य से पल्ला झाड़ेगा निर्माता अनाकर्षक किरदार पर डालेगा पर्दातीन बार दिन में लोटे से जल देगाऔर रुकने के आग्रह पर चल देगादेवता ऐसे आएगा कविता मेंजैसे दुर्घटना का साक्ष्य छुपाने को बिल्लीउलट दिशा में दौड़ेने लगेगा तुम्हारा अंतःकरण।
1m 58s · Feb 14, 2026
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